जैन धर्म में भी ज्योतिष शास्त्र का प्रयोग कोई नई बात नहीं है, बल्कि सदियों से प्रचुरता पूर्वक प्रयोग होता आया है। इसके अनुसार व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा जब किसी अन्य जीव में प्रवेश करती है तो उसमें तीन से चार प्रहर का समय लगता है। इस बात का भी ज्योतिष गण यहां ध्यान रखते हैं। हालांकि, इसको लेकर कुछ मतभेद भी है। बालक के जन्म लेने पर जिस समय उसकी नाल काटकर माता अलग की जाती है तो उस समय को ही बालक का जन्म समय मानते हुए उसकी जन्मकुंडली और फलकथन तैयार किया जाता है।
भारतीय ज्योतिष विद्या और जैन धर्म ज्योतिष के कई नियमों में समानताएं भी देखने को मिलती हैं। जातक की कुंडली के कमजोर ग्रह को मजबूत बनाने के लिए कुंडली अनुसार अलग–अलग ग्रहों के लिए पूजा–पाठ करने का विधान है जिसे यहां दिया जा रहा है। आपकी कुंडली के हिसाब से कौन से ग्रह कमजोर हैं उसे जानकर इन ज्योतिष उपायों को आजमाएं और एक सुखी ज़िन्दगी जियें एेसी हमारी कामना है।
सूर्य ग्रह की पूजा के लिए श्रद्धापूर्वक पद्मप्रभु भगवान की प्रार्थना करें।
चंद्र ग्रह की पूजा करने के लिए चंद्रप्रभु भगवान की प्रार्थना करें।
मंगल ग्रह की पूजा करने के लिए प्रभु वासुपूज्य की प्रार्थना करें।
बुध ग्रह की पूजा करने के लिए श्री विमलनाथ भगवान की प्रार्थना करें।
गुरु ग्रह की पूजा के लिए जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) जी की प्रार्थना करें।
शुक्र ग्रह की पूजा के लिए श्री सुविधिनाथ भगवंत की प्रार्थना करें।
शनि ग्रह की पूजा के लिए श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान की प्रार्थना करें।
राहु ग्रह की पूजा करने के लिए नेमिनाथ भगवान की प्रार्थना करें।
केतु ग्रह की पूजा के लिए भगवान श्री मल्लिनाथ जी की प्रार्थना करें।
जैन ज्योतिष के अनुसार मंत्र
जैन ज्योतिष के अनुसार ग्रह की स्थापना के लिए पंचिंदिय सूत्र का पाठ पढ़ें।
शनि की पनौती के लिए श्री मुनिसुव्रत स्वामी भगवान के मंत्र का जाप करें।
नवग्रह दोष नाशक जैन मंत्र “ॐ असिआउसा नमः” का जाप करें।
पितृदोष या इसके जैसे अन्य दोष के निवारण हेतु “श्री पार्श्व पद्मावती पूजन” जैसे उपायों का अनुसरण किया जाता है।
जैन धर्म के अनुसार ज्योतिष और ग्रह शांति पूजा के अंतर्गत कई ज्योतिष योग जैसे कि कालसर्प योग, दरिद्र योग, आश्लेषा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र के योग, नवग्रह शांति वगैरह के लिए “श्री विश्वमंगल नवग्रह पार्श्वनाथ प्रभु” की पूजा करके भी समस्या निवारण किया जाता है।
क्रोध, घमंड, लालच, आसक्ति और नफरत से बढ़कर कोई शत्रु नहीं है। खुद को पहचानकर सम्यक मार्ग पर चलें। यही भगवान महावीर का संदेश है।
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