दिन में पेड़ पौधे ऑक्सीजन देते हैं और कार्बन डाईऑक्साइड ग्रहण करते हैं, किन्तु रात्रि में वे इसके उल्टा ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाईऑक्साइड छोडते हैं। अतः दिन में वायु मण्डल में ऑक्सीजन प्रचुर मात्रा में रहती है, जबकि रात्रि में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा ही अधिक रहती है।
चूंकि ऑक्सीजन ज्वलनशील है और भोजन को पचाने में सहायक है, वह हमारे सांस द्वारा अन्दर जाकर हमारी जठराग्नि को प्रज्ज्वलित करती है, इसलिए दिन में भोजन सहजता से पच (हजम हो) जाता है; जबकि रात्रि में ऑक्सीजन की कमी और कार्बन डाईऑक्साइड के आधिक्य के कारण जठराग्नि प्रज्ज्वलित नहीं होती, इसलिए रात्रि में किया हुआ भोजन पचता नहीं है और पेट में पड़ा-पड़ा सड़ता रहता है।
रात्रि भोजन के परिणाम स्वरूप हमारे पेट में विजातीय द्रव्य इकट्ठा हो जाता है जो कि गैस्टिक ट्रबल पैदा करता है। गैस्टिक ट्रबल से कोष्ठबद्धता कब्ज पैदा हो जाती है, जो कि अन्य नाना प्रकार की बीमारियों का कारण है।
प्रमुखतया नजला, जुकाम, बालों का छोटी उम्र में ही सफेद हो जाना और जडना (टूटना), बालों का पतला हो जाना, सिर दर्द, पेट में सडांध पैदा होने के कारण पेट का बडा हो जाना, दाँतों में पायरिया हो जाना, यानि मसूडों में पीप पड जाना, गले में गिल्टियों का हो जाना, काग का छिटक जाना आदि-आदि।
यदि हम अपने बढे हुए पेट को कम करना चाहें और अन्य बीमारियों से बचना चाहें तो हमें भोजन दिन में ही करना होगा।
हमने इस विषय में प्रत्यक्ष अनुभव किए हैं। जिन-जिन बढे हुए पेट वालों ने रात्रि भोजन करना छोड दिया, उन सबका पेट ठीक हो गया और जिसे देखकर अन्य दूसरे लोग रात्रि भोजन करना छोडते जा रहे हैं। पेट को छोटा करने के लिए जुलाब लेना तथा अन्य चूरण-चटनियों का इस्तेमाल करना हानिप्रद है, कारण कि इनके प्रयोग से पेट तो ठीक हो जाएगा; किन्तु आँतें निष्क्रिय हो जाएगी और मूल कारण के बने रहने से शीघ्र ही दुबारा बढ जाएगा और बार-बार जुलाब आदि के प्रयोग से रोग अपनी जडें जमा लेगा।
इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता है कि केवल रात्रि भोजन ही उदर-विकार का एक मात्र करण नहीं है, इसके अन्य भी अनेक कारण हैं, किन्तु उन सब में रात्रि भोजन ही प्रमुख कारण है।
रात्रि में भोजन करने वाले विवाहित लोग जो अधिकतर रात्रि में नो या दस बजे भोजन करते हैं, प्रायः भोजन करते ही सोने चले जाते हैं, जबकि सांयकालीन भोजन और सोने में कम से कम ढाई घण्टे का फासला अवश्य रहना चाहिए। जो लोग देर रात्रि में भोजन के तुरंत बाद सोने चले जाते हैं, उनमें कई लोग काम-वासना और रति-क्रीडा में संलग्न हो जाते हैं, ऐसे लोगों के फेंफडे जल्द खराब हो जाते हैं और उन्हें सांस संबंधी रोग हो जाते हैं।
जो भोजन दिन में बनाया जाता है, उसमें एक तो आँक्सीजन गैस मिलती है, दूसरे उसमें जहरीले किटाणु जो सूर्य की गरमी के कारण नष्ट हो जाते हैं, नहीं मिलते, जिसके कारण भोजन हल्का तथा सुपाच्य होता है।
रात्रि में बनाए भोजन में कार्बनडाई ऑक्साइड (जहरीला धुंआ) तथा जहरीले किटाणुओं का मिश्रण होता है, जिसके कारण भोजन विषाक्त तथा पचने में भारी होता है। अतः भोजन दिन का बना हुआ ही प्रयोग में लाना चाहिए।
भोजन जीने के लिए किया जाता है, किन्तु आज लोग भोजन करने के लिए जीना चाहते हैं। जब देखो खाना चलता ही रहता है। यह स्थिति अच्छी नहीं है। श्रमजीवी लोगों को भोजन दो बार करना उचित है। एक दिन में प्रातःकाल और दूसरा सांयकाल। किन्तु विद्यार्थियों तथा बुद्धिजीवियों को भोजन दिन में एक बार करना चाहिए और वह भी अधिक से अधिक दो बजे तक, ताकि दिन छिपने तक अर्थात् जब तक आँक्सीजन प्रचुर मात्रा में होती है, भोजन पच जाए। इसके बाद तो भोजन सडेगा ही। इसके अलावा प्रातः व्यायाम करने के बाद थोडा दूध लेना चाहिए तथा दोपहर बाद थोडे फल लेने चाहिए।
वैद्यराज धन्वन्तरी ने लिखा है-
दिनांते दुग्धं पिवेत्, निशान्ते च पिवेत् वारि।
यानि दिन के अंतिम भाग में दूध पीना चाहिए तथा रात्रि व्यतीत होने पर प्रातःकाल जल पीना चाहिए।
यहां रात्रि में न तो भोजन करने को कहा गया है और न किसी किस्म का पेय ही पीने को। अतः यदि मनुष्य को स्वस्थ रहना हितकर है तो वह रात्रि में कदापि ना तो भोजन करे और न कुछ पिए ही।
जय जिनेन्दर
— महेंद्र जैन चैन्नय

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